Sone KI Lanka Kiski

सोने की लंका किसकी थी ?

वास्तव में रावण की तो थी नहीं , पर आख़िर किसकी ?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, सोने की लंका का निर्माण देव शिल्पी विश्वकर्मा ने किया था। यह महल उन्होंने किसी राजा या राक्षस के लिए नहीं, बल्कि स्वयं भगवान शिव और माता पार्वती के लिए बनाया था। पूरी कहानी कुछ इस तरह है:

  1. पार्वती की इच्छा: भगवान शिव हमेशा से एक साधारण जीवन जीना श्रेष्ठ समझकर अपने परिवार के साथ कैलाश पे निवास करते हैं , और भगवान ने कभी वैभवशाली भवन की कामना नहीं की I माता पार्वती ने देखा कि सभी देवी-देवताओं के पास भव्य महल हैं, लेकिन उनके पास कोई ऐसा आलीशान निवास नहीं है। देवी लक्ष्मी के वैभवशाली महल को देखकर उनके मन में भी एक सुंदर महल में रहने की इच्छा जागी। उन्होंने यह इक्षा भगवान शिव को बताई।
  1. विश्वकर्मा को आदेश: माता पार्वती की इच्छा का सम्मान करते हुए, भगवान शिव ने देव शिल्पी विश्वकर्मा को बुलाया और उन्हें एक ऐसा महल बनाने का आदेश दिया जो तीनों लोकों में सबसे सुंदर हो। विश्वकर्मा ने अपनी दिव्य शक्तियों और अद्भुत शिल्प कौशल का उपयोग करके लंका द्वीप पर एक भव्य और चमचमाता हुआ महल तैयार किया। क्योंकि यह महल महादेव और पार्वती के लिए बनाया जा रहा था, कुबेन ने अपने धन और सोने का सारा खजाना खोल दिया , इसके कारण यह महल पूरी तरह से सोने का बना था, इसीलिए इसे सोने की लंका कहा गया।
  1. रावण का प्रवेश: जब महल बनकर तैयार हो गया, तो गृह प्रवेश और वास्तु शांति की पूजा का समय आया। इस पूजा को संपन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक सबसे बड़े विद्वान और ज्ञानी ब्राह्मण की तलाश की। रावण, जो उस समय एक महान तपस्वी और प्रकांड पंडित था, अपने पिता ऋषि विश्रवा से भी अधिक ज्ञानी और शक्तिशाली माना जाता था। रावण चारों वेदों, ज्योतिष और अन्य शास्त्रों का गहरा जानकार था। उसकी विद्वता इतनी महान थी कि उसे ‘दशानन’ (दस सिर वाला) कहा जाता था, जो उसके दस गुना अधिक ज्ञान को दर्शाता है। यही कारण था कि भगवान शिव ने स्वयं रावण को इस महत्वपूर्ण पूजा के लिए आमंत्रित किया ।

  1. रावण की दक्षिणा: रावण ने पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ यह पूजा संपन्न कराई। जब पूजा समाप्त हुई, तो भगवान शिव ने रावण से पूछा कि वह दक्षिणा में क्या चाहता है। पहले तो उसने कोई भी दक्षिणा लेने से मना कर दिया और बोला मैं तो स्वयं आपका भक्त हूं, आपसे दक्षिणा कैसे ले सकता हूं। फिर माता पार्वती ने कहा कि बिना दक्षिणा के तो ये पूजा संपूर्ण नहीं होगी, आपको अपनी इच्छानुसार कुछ लेना होगा।

रावण के मन में पहले से ही भवन का वैभव घर कर चुका था, माता पार्वती के द्वारा विनती किये जाने पर , अपनी चालाकी और अहंकार का परिचय देते हुए भगवान शिव से कहा कि वह यह सोने की लंका ही दक्षिणा के रूप में चाहता है।

  1. लंका रावण को मिली: भगवान शिव एक वचनबद्ध देवता थे। उन्होंने रावण की इस मांग को स्वीकार कर लिया और सोने की लंका उसे दान में दे दी। इस प्रकार, जो लंका भगवान शिव और माता पार्वती के निवास के लिए बनाई गई थी, वह रावण के अधिकार में आ गई।

रावण ने उस सोने की लंका को अपनी राजधानी बनाया और पूरे राज्य पर वहां से राज किया  । लेकिन लालच और चल के बल अर्जित वैभव कब तक रहेगा  इसीलिए  जब हनुमान जी माता सीता की खोज में लंका पहुंचे, तो उन्होंने रावण का घमंड तोड़ने के लिए पूरी सोने की लंका को को ही जला दिया ।           

हर हर महादेव

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