श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर खीरा क्यों काटते हैं

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर खीरा क्यों काटते हैं- विधि और मंत्र

जन्माष्टमी पर खीरा काटने के पीछे एक बहुत ही खास और प्रतीकात्मक कारण है, जो भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से जुड़ा हुआ है। इसे ‘नाल छेदन’ की रस्म भी कहा जाता है, और इसके मुख्य कारण नीचे दिए गए हैं:

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा की कारागार में हुआ था। उनके माता-पिता वसुदेव और देवकी को कंस ने बंदी बना रखा था, क्योंकि भविष्यवाणी थी कि देवकी का आठवां पुत्र कंस का वध करेगा।

जब आठवां पुत्र (श्रीकृष्ण) जन्म लेने वाले थे, तो रात के समय तेज गर्जन, बिजली और वर्षा होने लगी। जन्म के तुरंत बाद वसुदेव जी को दिव्य संकेत मिला कि वे नवजात कृष्ण को यशोदा के घर गोकुल पहुँचा दें और वहाँ से नंदबाबा के घर की कन्या को ले आएँ।

लेकिन कारागार के द्वार बंद थे और पहरेदार सो रहे थे। तभी चमत्कार हुआ, वसुदेव जी की बेड़ियाँ अपने आप खुल गईं , जेल के द्वार खुल गए, यमुना नदी का जल रास्ता देने के लिए हट गया, इस चमत्कारिक मुक्ति का प्रतीक खीरे को काटना माना जाता है। खीरे का बाहरी आवरण कारागार की दीवार की तरह है। अंदर का हिस्सा गर्भ/बंधनों का प्रतीक है। उसे काटकर खोलना मतलब बंधन से मुक्ति और नए जीवन का आगमन

प्रतीकात्मक चित्रण

नाल का प्रतीक: खीरे का डंठल (डंठल वाला खीरा) बच्चे की गर्भनाल का प्रतीक माना जाता है। जिस तरह बच्चे के जन्म के बाद गर्भनाल को काटकर उसे माँ से अलग किया जाता है, उसी तरह जन्माष्टमी की रात 12 बजे खीरे के डंठल को काटकर यह दर्शाया जाता है कि भगवान कृष्ण का जन्म हो गया है और वह अपनी माता देवकी से अलग हो गए हैं।

जन्म का प्रतीक: खीरे को माता देवकी के गर्भ का प्रतीक माना जाता है। कई जगहों पर लड्डू गोपाल की मूर्ति को डंठल वाले खीरे के अंदर रखा जाता है, और फिर आधी रात को खीरा काटकर उन्हें बाहर निकाला जाता है। यह भगवान के जन्म की प्रक्रिया को दर्शाता है।

बंधन से मुक्ति: भगवान कृष्ण का जन्म कारावास में हुआ था। खीरे को काटकर बाहर निकालना कारागार और सभी बंधनों से उनकी मुक्ति का प्रतीक है।

यह परंपरा सिर्फ एक रस्म नहीं है, बल्कि यह भगवान कृष्ण के जन्म के पवित्र और आनंदमय पल को महसूस करने और मनाने का एक तरीका है। यह दर्शाता है कि सच्ची भक्ति के लिए किसी भी महंगी वस्तु की नहीं, बल्कि सरलता और प्रेम की आवश्यकता होती है।

इसी वजह से, कुछ स्थानों पर जन्माष्टमी की पूजा में आधी रात खीरा काटा जाता है — यह कृष्ण के जन्म और उनके कारागार से बाहर आने का प्रतीक है।

खीरा काटने की विधि और मंत्र

1. खीरे का चुनाव

पूजा के लिए ताज़ा, लंबा और हरा खीरा लिया जाता है। खीरे के ऊपर का डंठल (जहाँ से तोड़ा गया है) बच्चे के सिर का प्रतीक माना जाता है, इसलिए पहले इसे प्रणाम किया जाता है।

2. पूजा से पहले

खीरे को दूध और गंगाजल से धोया जाता है। फिर इसे लाल कपड़े या फूलों की थाली में रखा जाता है।

3. मध्यरात्रि (भगवान कृष्ण जन्म का समय)

खीरे को दोनों हाथों में लेकर, उसके ऊपर तिलक और अक्षत (चावल) चढ़ाया जाता है। घर की बड़ी महिला (या पंडित) पहले भगवान के नाम का उच्चारण करती है – “जय कन्हैया लाल की”

4. काटने का तरीका

खीरे को एक ओर से हल्का सा छेद दिया जाता है, जैसे माँ के गर्भ से बच्चा बाहर निकल रहा हो। फिर धीरे-धीरे इसे बीच से काटा जाता है। काटते समय मंत्र बोला जाता है — “कंस के बंधन टूटे, यशोदा नंदलाल आये”, “हरे कृष्ण, हरे गोविंद”

5. प्रसाद में वितरण

काटे गए खीरे के टुकड़े, दूध-माखन के साथ मिलाकर प्रसाद में बाँटे जाते हैं। इसे खाने से घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है, ऐसी मान्यता है।

आप सबको कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई
राधे राधे

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