एक बार लंकापति रावण की इच्छा हुई कि वो पूरे संसार पे विजय कर उस पे राज करे, और इसी इच्छा के कारण वो संसार की विजय यात्रा पर निकल गया। उसने संसार के अधिकांश स्थानों पर विजय प्राप्त कर ली थी। लंकापति रावण अपनी दिग्विजय यात्रा पे था और कैलाश की ओर अपने पुष्पक विमान से जा रहा था। अचानक, एक अत्यंत सुंदर और बर्फीले पर्वत (कैलाश) के पास पहुँचते ही उसका विमान रुक गया। वह आगे नहीं बढ़ पा रहा था।
अपने स्वामी के निवास स्थान पे विघ्न देखकर नंदी देव को काफी गुस्सा आया । नंदी ने रावण को चेतावनी दी— “हे रावण! आगे मत जाओ, इस पर्वत पर महादेव और माता पार्वती विहार कर रहे हैं। मर्यादा के नाते इस मार्ग को छोड़ दो।“
रावण अपने बल के घमंड में चूर था , नंदी को देखकर रावण मुस्कुराने लगा। उसने वहां कुछ बंदरों को भी देखा और उनका काफी मज़ाक उड़ाने लगा। यह सारी स्थिति और बंदरों के मज़ाक उड़ाने पे नंदी काफी क्रोधित हुए और उसे श्राप दिया कि— “तेरा विनाश इन्हीं वानरों के कारण होगा।“
कैलाश को उठाने का दुस्साहस
अपमान से तिलमिलाया रावण चिल्लाया— “यह पर्वत मेरे विजय यात्रा मार्ग में बाधा डाल रहा है, इस पहाड़ को जड़ से उखाड़ फेंक दूंगा !”
उसने अपनी बीस भुजाएँ पर्वत के नीचे फँसाईं और पूरी ताकत लगाकर कैलाश को ऊपर उठा लिया। पर्वत हवा में डोलने लगा। कैलाश पर स्थित जीव-जंतु, ऋषि-मुनि और स्वयं माता पार्वती विचलित हो गईं। पूरी सृष्टि कांपने लगी कि आखिर यह क्या अनर्थ हो रहा है।
महादेव का एक अंगूठा और रावण की चीख
भगवान शिव, जो परम शांत भाव में बैठे थे, सब देख रहे थे। उन्होंने देखा कि उनके भक्त का अहंकार उसकी बुद्धि को खा गया है। माता पार्वती के भय को दूर करने और रावण के अभिमान को कुचलने के लिए महादेव ने मुस्कुराते हुए अपने बाएं पैर के अंगूठे से पर्वत को हल्का सा नीचे दबा दिया।
इसके बाद पर्वत का भार इतना बढ़ गया कि रावण की बीसों भुजाएँ उसके नीचे दब गईं। वह दर्द से तड़प उठा। उसकी चीख (राव) इतनी भयानक थी कि तीनों लोक कांप उठे।
शिव ताण्डव स्तोत्र का जन्म
कई वर्षों तक रावण के हाथ पर्वत के नीचे दबे रहे। उसे समझ आ गया कि महादेव की शक्ति के आगे वह कुछ भी नहीं है। अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिए और शिव को प्रसन्न करने के लिए, उसने उसी असहनीय पीड़ा में ही महादेव की स्तुति करना शुरू किया।
स्तुति करते करते उसने स्तुति को एक छंदबंध तरीके से रचना ही बना दिया। बाद में इस रचना को शिव तांडव स्तोत्र का नाम दिया गया।
“जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले…”
यह स्तुति इतनी शक्तिशाली और भक्तिपूर्ण थी कि महादेव अत्यंत प्रसन्न हो गए। उन्होंने अपना पैर उठाया और रावण को मुक्त कर दिया।
वरदान और शिक्षा
यह कहानी सिखाती है कि चाहे आप कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, ईश्वर के विधान और प्रकृति के विरुद्ध जाने पर अंत में झुकना ही पड़ता है। भक्ति में जब तक अहंकार रहता है, तब तक वह पूर्ण नहीं होती। कैलाश पर्वत को उठाने का दुस्साहस रावण के जीवन की एक ऐसी घटना थी, जिसने उसे उसकी सीमाओं का बोध कराया।
महादेव ने केवल अपने पैर के अंगूठे के दबाव से रावण को यह अहसास दिला दिया कि संपूर्ण ब्रह्मांड का नियंत्रण उस परम शक्ति के हाथ में है। लेकिन इस घटना का सबसे सुंदर पहलू यह है कि पीड़ा से ही प्रार्थना का जन्म हुआ। जब रावण का अभिमान चूर-चूर हुआ, तब उसके मुख से ‘शिव ताण्डव स्तोत्र’ के रूप में एक ऐसी अद्भुत रचना निकली जो युगों-युगों तक अमर हो गई।
अंततः, यह गाथा सिद्ध करती है कि महादेव केवल दंड देने वाले नहीं, बल्कि सुधारने वाले देव हैं। वे अहंकार को कुचलते हैं ताकि भक्त का हृदय शुद्ध हो सके और वह भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ सके। क्या आपको पता है कि इस घटना के अंत में महादेव ने रावण पे प्रसन्न होकर उसे एक अजेय तलवार ‘चंद्रहास’ प्रदान की और उसे सबसे बड़ा विद्वान होने का आशीर्वाद दिया।
II हर हर महादेव II

