पुराणों और विभिन्न ग्रंथों में यह कथा आती है कि रावण ने शनिदेव को बंदी बना लिया था। इसके पीछे मुख्य कारण रावण का अहंकार और ज्योतिषीय प्रभावों का भय बताया जाता है। संक्षेप में कथा इस प्रकार है:
शनिदेव को एक न्यायप्रिय देवता के रूप में देखा जाता है और जो गलत कर्म और पाप का भागी बनता है, शनिदेव की उस व्यक्ति पर टेढ़ी दृष्टि जाती है , इसीलिए कुछ लोग शनिदेव को क्रूर ग्रहों की श्रेणी में भी रखते हैं । ऐसा माना जाता है कि अगर शनिदेव की टेढ़ी दृष्टि जिस पर पड़ जाए वो परेशानियों से घिर जाता है, और वही अगर इनकी शुभ दृष्टि किसी पर पड़ जाए तो वह व्यक्ति जमीन से आसमान पर पहुँच जाता है. आज के समय जितना लोग शनि देव से डरते हैं शायद ही किसी और ग्रह से डरते होंगे।
लेकिन क्रूर ग्रह होने के बावजूद भी कैसे रावण ने इन्हें बंदी बना लिया, इसके पीछे की वजह क्या थी, क्या आप जानते हैं?
मेघनाद (इंद्रजीत) के जन्म का समय
रावण एक शक्तिशाली असुर होने के साथ-साथ बहुत ज्ञानी और विद्वान् भी था। वह चाहता था कि उसका पुत्र इंद्रजीत (मेघनाथ) महान योद्धा बने और दीर्घायु हो और देवताओं को पराजित करने वाला हो। । इसके लिए उसने सभी ग्रहों को अपने अनुकूल स्थिति में लाने की योजना बनाई कि सारे ग्रह मेघनाथ को बल प्रदान करें। जब रावण की पत्नी मंदोदरी गर्भवती हुई तो रावण ने सभी ग्रहों को अपने वश में करने के लिए तपस्या की।
सभी ग्रहों ने रावण की बात मान ली, लेकिन शनिदेव ने रावण की बात नहीं मानी । शनिदेव न्यायप्रिय और सत्य के पक्षधर माने जाते हैं। जब रावण ने सभी ग्रहों को एक विशेष योग में खड़े होने को कहा तो शनिदेव ने रावण के भय के कारण अनिच्छा से तो स्थान ग्रहण किया, परंतु उन्होंने अपनी टेढ़ी दृष्टि मेघनाद की कुंडली पर डाल दी, और आप तो जानते हैं शनिदेव की टेढ़ी दृष्टि विपरीत फल देती है।
अपनी वक्र दृष्टि मेघनाथ के जन्म के समय कुछ ऐसी टेढ़ी रखी जिसके कारण मेघनाथ का वध हो सकता था। इससे रावण बहुत क्रोधित हुआ और दंडस्वरूप शनि देव के पैर पर प्रहार कर दिया और बंदी बना कर अपनी लंका में उल्टा लटका दिया ताकि वे किसी पर दृष्टि डालकर उसके अहंकार को चुनौती न दें।
माना जाता है कि तभी से शनिदेव लंगड़ाकर चलते हैं, और सबसे धीमी गति से चलने वाले ग्रहों में शनि सबसे आगे है। इन कथाओं के कारण ही शनिदेव को शनिश्चर (शनैः शनैः चरति इति शनिश्चरः – जो धीरे-धीरे चले) भी कहा जाता है, क्योंकि उनकी धीमी चाल के कारण ही वे एक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक रहते हैं, जिसे ज्योतिष में “ढैय्या” कहा जाता है।

कई वर्षों के बाद में जब हनुमान जी सीता माता की खोज में लंका गए तब उन्होंने शनिदेव को वहाँ बंदी बना देखा। तब हनुमान जी ने शनिदेव को रावण की कैद से मुक्त कराया। इस घटना के बाद शनिदेव ने हनुमान जी को वचन दिया कि जो भी हनुमान जी की पूजा करेगा, उसे शनिदेव की साढ़ेसाती या उनके अन्य प्रतिकूल प्रभावों से मुक्ति मिलेगी। इस कारण से शनि देव की कुदृष्टि से बचने के लिए और शनिदेव की कृपा पाने के लिए हनुमान जी की पूजा करते हैं।
हर हर महादेव 🙏 जय श्री राम 🙏 जय हनुमान 🙏 जय शनि देव 🙏


