रक्षाबंधन का इतिहास, Raksha Bandhan Ka Itihas

रक्षाबंधन आखिर क्यों मनाते हैं? II रक्षाबंधन का इतिहास

रक्षाबंधन हिंदू का एक लोकप्रिय त्योहार है जो भी-बहन के प्रेम और बंधन का प्रतीक है। इस दिन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है, जो उनकी सुरक्षा और समृद्धि के लिए प्रार्थना का प्रतीक है। बदले में भाई अपनी बहन को उपहार देते हैं और उनकी रक्षा करने का वादा करते हैं।

रक्षाबंधन की एक नहीं अनेक कहानी है। आइये जानते हैं रक्षाबंधन की कुछ प्रसिद्ध कहानियाँ जो आगे बतायी गयी हैं I

राजा बलि और लक्ष्मी की कहानी:

यह कथा भगवान विष्णु के वामन अवतार की है। जब भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी थी, और राजा बलि ने दानवीरता दिखाते हुए उन्हें सब कुछ दे दिया था, तब भगवान विष्णु ने बलि को वचन दिया था कि वे स्वयं पाताल लोक में  निवास करेंगे।

अपने प्रिय भक्त राजा बलि को दिए गए इस वचन के कारण, भगवान विष्णु पाताल लोक में बलि के महल में रहने लगे। वैकुंठ में उनके बिना, देवी लक्ष्मी अत्यंत चिंतित और उदास रहने लगीं। उन्हें अपने पति से बिछोह असहनीय हो रहा था।

नारद जी की सलाह पर, देवी लक्ष्मी एक गरीब स्त्री का वेश धारण कर पाताल लोक पहुंचीं। वह सावन मास की पूर्णिमा का दिन था। देवी लक्ष्मी सीधे राजा बलि के महल गईं और उन्हें बताया कि वह एक असहाय स्त्री हैं और उनका कोई भाई नहीं है, इसलिए वह राजा बलि को अपना भाई बनाना चाहती हैं। देवी लक्ष्मी की बात सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने सहर्ष देवी लक्ष्मी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया। देवी लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर रक्षासूत्र (राखी) बाँधा और उनके माथे पर तिलक किया।

रक्षाबंधन की रस्म पूरी होने के बाद, राजा बलि ने अपनी नई बहन से पूछा कि वह उनसे क्या वरदान चाहती हैं। देवी लक्ष्मी ने मुस्कुराते हुए कहा, “भैया! मुझे आपसे कुछ और नहीं चाहिए, बस मेरे पति को वापस दे दीजिए।” राजा बलि यह सुनकर चौंक गए, क्योंकि उन्हें तुरंत समझ आ गया कि यह कोई साधारण स्त्री नहीं, बल्कि स्वयं देवी लक्ष्मी हैं, और उनके पति स्वयं भगवान विष्णु हैं, जो उनके ही महल में द्वारपाल बनकर रह रहे हैं।

राजा बलि ने अपनी बहन देवी लक्ष्मी की बात को स्वीकार किया। उन्होंने भगवान विष्णु से वैकुंठ वापस लौटने का आग्रह किया और अपनी बहन को यह वचन दिया कि वे हर साल कार्तिक मास में चार महीने के लिए भगवान विष्णु को पाताल लोक में निवास करने देंगे (यह वही समय है जब भगवान विष्णु योग निद्रा में जाते हैं, जिसे चातुर्मास भी कहते हैं)।

द्रोपदी और कृष्ण की कहानी:

इस पर्व से जुड़ी कई कथाओं में से एक भगवान कृष्ण और द्रौपदी की कहानी सबसे मार्मिक और प्रसिद्ध है।

महाभारत काल में शिशुपाल का वध करते समय, सुदर्शन चक्र से भगवान कृष्ण की तर्जनी उंगली पर चोट लग गई और उससे रक्त बहने लगा। यह देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग चिंतित हो गए। कई लोग कपड़े का टुकड़ा ढूंढने लगे ताकि रक्त को रोका जा सके। तभी, द्रौपदी, जो उस समय वहीं मौजूद थीं, ने बिना एक पल भी सोचे, अपनी बहुमूल्य साड़ी का एक कोना फाड़ दिया और उसे भगवान कृष्ण की उंगली पर बाँध दिया। यह छोटा सा कार्य, द्रौपदी के निस्वार्थ प्रेम और भक्ति का प्रतीक था। भगवान कृष्ण द्रौपदी के इस निःस्वार्थ भाव से अत्यंत प्रसन्न हुए।

द्रौपदी के इस प्रेमपूर्ण कार्य से अभिभूत होकर, भगवान कृष्ण ने उन्हें वचन दिया कि वे इस ‘ऋण’ को अवश्य चुकाएंगे। उन्होंने द्रौपदी से कहा, “हे द्रौपदी! तुमने मेरी रक्षा की है, और मैं आजीवन तुम्हारी हर संकट से रक्षा करूँगा। यह एक धागा नहीं, बल्कि मेरे और तुम्हारे बीच का अटूट बंधन है।” कृष्णा ने इस बंधन को याद रखा और जब दुःसासन ने द्रोपदी का चीरहरण किया तब कृष्णा ने द्रोपदी की लाज बचाई।

इंद्र और इंद्राणी:

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवराज इंद्र को दैत्यराज वृत्रासुर से भीषण युद्ध करना पड़ा था। वृत्रासुर अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर था, और उसने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग लोक पर अधिकार कर लिया था। इंद्र और देवताओं को इस युद्ध में लगातार हार का सामना करना पड़ रहा था, जिससे वे अत्यंत चिंतित और भयभीत थे।

अपनी पति की दुर्दशा और देवताओं की हार देखकर, इंद्राणी (इंद्र की पत्नी) अत्यंत व्यथित और चिंतित थीं। वह अपने पति की सुरक्षा और विजय के लिए हर संभव प्रयास करना चाहती थीं।

बृहस्पति देव के निर्देशानुसार, इंद्राणी ने सावन पूर्णिमा के दिन, समस्त देवी-देवताओं और ब्राह्मणों की उपस्थिति में, विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। उन्होंने अपनी पूर्ण श्रद्धा और शक्ति से मंत्रों का उच्चारण किया और एक पवित्र धागा (रक्षा सूत्र) तैयार किया।

इसके बाद, इंद्राणी ने उस पवित्र रक्षा सूत्र को देवराज इंद्र की कलाई पर बाँधा। यह सूत्र केवल एक धागा नहीं था, बल्कि इंद्राणी के प्रेम, विश्वास, शक्ति और पति की सुरक्षा के लिए उनकी प्रार्थनाओं का प्रतीक था। यह बंधन इंद्र को मानसिक शक्ति और आत्मविश्वास प्रदान करने वाला था।

इस रक्षा सूत्र को बाँधने के बाद, इंद्र ने नए उत्साह और शक्ति के साथ वृत्रासुर पर आक्रमण किया। इस बार, इंद्राणी की प्रार्थनाओं और रक्षा सूत्र की शक्ति के कारण, देवराज इंद्र को अद्भुत बल प्राप्त हुआ। उन्होंने भीषण युद्ध में वृत्रासुर को पराजित कर उसका वध कर दिया, और स्वर्ग लोक को पुनः प्राप्त किया।

यह कहानी दर्शाती है कि रक्षाबंधन का पर्व केवल भाई-बहन के प्रेम तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह समर्पण, सुरक्षा और विश्वास का एक व्यापक प्रतीक है। इस कहानी में पत्नी ने अपने पति की रक्षा के लिए एक पवित्र बंधन बाँधा। यह कथा रक्षाबंधन के नाम की उत्पत्ति से भी जुड़ी है, जहाँ ‘रक्षा’ का अर्थ है सुरक्षा और ‘बंधन’ का अर्थ है बाँधना।

Happy Raksha Bandhan

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