भगवान शिव का अपने शरीर पर भस्म (राख) लगाना उन्हें अन्य सभी देवताओं से अलग और निराला बनाता है। इसके पीछे धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक तीनों कारण छिपे हैं।
यहाँ विस्तार से बताया गया है कि महादेव भस्म क्यों धारण करते हैं:
1. वैराग्य और त्याग का प्रतीक
भस्म इस बात का प्रतीक है कि भगवान शिव को इस भौतिक संसार की सुंदरता, धन-दौलत और मोह-माया से कोई लगाव नहीं है। जहाँ अन्य देवता आभूषण और सुंदर वस्त्र धारण करते हैं, वहीं शिव जी राख लपेटकर यह बताते हैं कि वे ‘अघोरी’ और ‘संन्यासी’ हैं।
2. जीवन की अंतिम सत्यता (नश्वरता)
भस्म हमें यह याद दिलाती है कि यह शरीर नश्वर है। एक न एक दिन हर वस्तु, चाहे वह कितनी भी सुंदर क्यों न हो, जलकर राख हो जाएगी और मिट्टी में मिल जाएगी। शिव जी भस्म लगाकर संदेश देते हैं कि अंत में सब कुछ ‘शून्य’ हो जाना है, इसलिए अहंकार करना व्यर्थ है।
3. सती की याद और प्रेम की कथा
एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता सती ने अपने पिता के यज्ञ में आत्मदाह कर लिया था, तब शिव जी वियोग में उनके पार्थिव शरीर को लेकर तीनों लोकों में घूमने लगे थे। जब सती का शरीर जलकर भस्म हो गया, तब शिव जी ने उनकी याद में उस पवित्र भस्म को अपने शरीर पर लगा लिया था। यह उनके अटूट प्रेम और विरक्ति को दर्शाता है।
4. वैज्ञानिक और प्राकृतिक कारण
शिव जी कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं, जहाँ अत्यधिक ठंड होती है।
रक्षा कवच: शरीर पर भस्म मलने से त्वचा के रोम छिद्र (pores) बंद हो जाते हैं, जिससे शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकलती और कड़ाके की ठंड से बचाव होता है।
शुद्धता: भस्म को सबसे शुद्ध माना जाता है क्योंकि यह अग्नि में तपकर बनती है। इसमें कोई कीटाणु नहीं होते। जिस प्रकार सोना अग्नि में तपकर शुद्ध होता है, उसी प्रकार भस्म भी पवित्रता का प्रतीक है।
सीख: यह हमें अपने विकारों (काम, क्रोध, लोभ) को जलाकर अपने चरित्र को शुद्ध बनाने की प्रेरणा देती है।
भस्म लगाने का आध्यात्मिक अर्थ
संस्कृत में एक कहावत है— “मृत्युंजय मंत्र“ की तरह ही भस्म भी अमरता का संदेश देती है। भस्म लगाने का अर्थ है अपने दोषों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) को जलाकर राख कर देना और अपने मन को शुद्ध बनाना।
उज्जैन का भस्म आरती महत्व
मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर में आज भी हर सुबह शिव जी की ‘भस्म आरती’ की जाती है। माना जाता है कि जो इस आरती के दर्शन कर लेता है, उसके अकाल मृत्यु के योग टल जाते हैं। उज्जैन के श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग में होने वाली ‘भस्म आरती’ पूरे विश्व में अद्वितीय है। यह दुनिया का इकलौता ऐसा मंदिर है जहाँ भगवान शिव की साक्षात भस्म से आरती की जाती है। आरती के दौरान भगवान महाकाल का अद्भुत श्रृंगार किया जाता है।
इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व निम्नलिखित है:
1. अकाल मृत्यु से मुक्ति
एक प्रसिद्ध मान्यता है— “अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करे चंडाल का, काल उसका क्या करे जो भक्त हो महाकाल का।” माना जाता है कि जो भक्त महाकाल की भस्म आरती के दर्शन कर लेता है, उसे अकाल मृत्यु (समय से पूर्व मृत्यु) का भय नहीं रहता और वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
2. श्मशान के अधिपति
महाकाल को ‘मृत्यु का देवता’ माना जाता है। भस्म आरती इस बात का प्रतीक है कि भगवान शिव श्मशान के अधिपति हैं और अंत में पूरी सृष्टि उन्हीं में विलीन होनी है। यह आरती दर्शाती है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है।
3. ताजी भस्म का रहस्य
- पौराणिक परंपरा: प्राचीन काल में ऐसी मान्यता थी कि यह आरती ताजी जलती हुई चिता की भस्म से की जाती थी।
- वर्तमान परंपरा: अब यह आरती कपिला गाय के गोबर से बने कंडे (उपले), शमी, पीपल, पलाश, बड़ और अमलतास की लकड़ियों को जलाकर तैयार की गई विशुद्ध भस्म से की जाती है। भस्म को एक सूती कपड़े से छानकर भगवान पर छिड़का जाता है (जिसे ‘भस्मीभूत’ करना कहते हैं)। यह दृश्य इतना दिव्य होता है कि भक्त भाव-विभोर हो जाते हैं।
4. नियम और मर्यादा
इस आरती के कुछ विशेष नियम हैं:
- यह आरती सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 बजे के करीब) में होती है।
- आरती के समय पुरुषों को केवल धोती पहननी होती है और महिलाओं को साड़ी पहनना अनिवार्य है।
- एक विशेष समय पर (जब भगवान को भस्म चढ़ाई जाती है), महिलाओं को घूंघट करने या आँखें बंद करने को कहा जाता है क्योंकि उस समय महादेव अपने निराकार रूप में होते हैं।
निष्कर्ष: उज्जैन की भस्म आरती केवल एक पूजा नहीं, बल्कि साक्षात शिव और काल (समय) के मिलन का अनुभव है। यह हमें सिखाती है कि हम चाहे कितने भी बड़े पद पर हों, अंत में हमें राख ही होना है, इसलिए प्रेम और भक्ति ही जीवन का सार है।
जय महाकाल II हर हर महादेव

