देवशयनी एकादशी का रहस्य

देवशयनी एकादशी का रहस्य

जानिए पूजा कैसे करें

-चतुर्मास में कौन रखता है सृष्टि का ध्यान

इसके पीछे की कथा क्या है

2025 में  आषाढ़ शुक्ल पक्ष की यह एकादशी 5 जुलाई की शाम 7 बजे लगेगी और 6 जुलाई की रात 09:16 बजे तक रहेगी। देवशयनी एकादशी के दिन व्रत करना, पूजा-अर्चना करना और दान-पुण्य करना विशेष फलदायी माना गया है। 

ऐसा माना जाता है कि इस दिन से भगवान विष्णु शेषनाग पर क्षीर सागर में चार महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं. चार महीनों  बाद प्रबोधिनी एकादशी – (हिंदू माह कार्तिक )( और अंग्रेजी में अक्टूबर-नवंबर) – को भगवान विष्णु अपनी निद्रा से जागते हैं। ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान विष्णु विश्राम में होते हैं, तब सृष्टि का संचालन भगवान शिव और अन्या देवी देवताओं द्वारा के द्वारा किया जाता है।

देवशयनी एकादशी की शाम को, विशेष रूप से सायंकाल में भगवान विष्णु को शयन कराया जाता है। इस दिन श्रद्धा अनुसार भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर, घर के पूजा स्थान पर स्थापित करें। फिर मंत्रों के साथ उनका पूजन करें। पूजा के बाद एक सुंदर, सजी हुई शय्या तैयार करें और उसी पर भगवान को विराजमान करें। इसके साथ ही विशेष शयन मंत्रों का जाप करें, जिससे भगवान योगनिद्रा में प्रवेश करें। शयन के समय भगवान के समीप फल, मिष्ठान और सूखे मेवे अर्पित करना भी शुभ माना गया है। इस रात्रि जागरण करना अत्यंत पुण्यकारी होता है, जिसमें भजन-कीर्तन, भगवान की लीलाओं का स्मरण किया जाता है।

इस अवधि में सृष्टि का ध्यान कौन कौन रखता है

देवशयनी एकादशी के ठीक बाद गुरु पूर्णिमा आती है, अगले कुछ दिनों तक गुरु और शिक्षक ब्रह्मांड के सुचारू संचालन की जिम्मेदारी लेते हैं

गुरु पूर्णिमा के ठीक बाद सावन का महीना शुरू हो जाता है। सावन या श्रावण भगवान शिव को समर्पित है I इस अवधि में भगवान शिव सृष्टि का ध्यान रखते हैं

इसके बाद अगस्त और सितंबर को भाद्रपद के नाम से भी जाना जाता है और यह भगवान विष्णु के अवतार भगवान कृष्ण को समर्पित है। भाद्रपद के दौरान जन्माष्टमी भी मनाई जाती है। इसलिए भगवान शिव के बाद ब्रह्मांड की बागडोर भगवान कृष्ण के हाथों में आ जाती है।

उसके बाद चातुर्मास के दौरान ही गणेश चतुर्थी भी आती है। भगवान शिव के पुत्र और विघ्नहर्ता भगवान गणेश को समर्पित गणेश चतुर्थी आमतौर पर 10 दिनों तक मनाई जाती है और इस दौरान भगवान गणेश ब्रह्मांड के कार्यों को संभालते हैं।

गणेश चतुर्थी के तुरंत बाद नवरात्रि आती है। नौ रातों का यह त्यौहार माँ दुर्गा को समर्पित है और इस दौरान वह सब कुछ नियंत्रण में रखने की ज़िम्मेदारी संभालती हैं। बुराई का नाश करने वाली होने के नाते, वह सुनिश्चित करती हैं कि उस दौरान कुछ भी खतरनाक या नकारात्मक न हो।

नवरात्रि के तुरंत बाद दिवाली का त्यौहार आता है। और दिवाली के दौरान, माँ लक्ष्मी और भगवान कुबेर का शासन माना जाता है। दिवाली का त्यौहार लगभग 5-10 दिनों तक चलता है, जिसके दौरान दोनों ब्रह्मांड का प्रबंधन करते हैं। इसीलिए दिवाली के दौरान लोग धन और समृद्धि की देवी माँ लक्ष्मी और कोषाध्यक्ष भगवान कुबेर की पूजा करते हैं।

और इस तरह, जब तक देवउठनी एकादशी नहीं आती और भगवान विष्णु अपनी गहरी नींद से नहीं जागते, तब तक अन्य देवता बारी-बारी से ब्रह्मांड का प्रबंधन करते हैं।

इसकी पौराणिक कथा

काफी समय पुरानी बात है ये  , सतयुग में मांधाता नामक एक चक्रवर्ती राजा हुआ करता था । उसके राज्य की प्रजा बहुत सुखी थी और राजा अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखते थे I परंतु एक समय ऐसा आया कि सारे परेशान हो गए I राज्य में लागातार तीन वर्ष तक बारिश नहीं हुई, जिसकी वजह से अकाल पड़ा गया था। पूरे राज्य में हर तरफ हाहाकार मच गया । जिसको जो समझ में आ रहा था वो उपाय किया, जैसे की हवन, यज्ञ कथा और व्रत । जब कुछ ना हो पाया तो सब अपनी परेशानी लेकर राजा के पास चले गए I राज्य के बारे में ऐसा सब कुछ सुनकर राजा भी बहुत चिंतित हो गए I

राजा को लगने लगा कि आखिर ऐसा कौन सी गलती हो गई है और इसका इतना बड़ा परिणाम सबको भुगतना पड़ रहा है । इस परेशानी का हल ढूंढने के लिए महाराज जंगल में ऋषि के आश्रम की तरफ चल दिए । वह ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम पहुंचे गए। ऋषिवर ने राजा का कुशलक्षेम और जंगल में आने की वजह पूछी।

राजा ने मुनि से अपनी सारी परेशानी बताई और ये भी बताया कि मैं तो पूरी निष्ठा से राज्य की देखभाल करता हूं और फिर भी ये समस्या क्यों आई I राजा ने मुनि से परेशानी का हल पूछा ।

मांधाता की बात को सुनकर महर्षि अंगिरा ने कहा कि आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करें। इस व्रत को करने से अपनी सारी समस्याओं का समाधान होगा I उसके बाद राजा अपना राज्य आ गए और इस व्रत को शुरू किया और सबको भी इस बारे में बताया कि वो भी इस व्रत को कर सकते हैं I

इस व्रत के प्रभाव से राज्य में मूसलधार बारिश हुई, और राज्य में सूखे की समस्या का हल निकलना शुरू हो गया । कहा जाता है कि देवशयनी एकादशी व्रत करने से भक्तों के सभी दुखों का अंत होता है। इसके साथ ही सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

राधे राधे

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