दिवाली के समय माता लक्ष्मी के साथ विष्णु भगवान विष्णु की पूजा इसलिए नहीं होती क्योंकि भगवान विष्णु चातुर्मास में सोये रहते हैं । मान्यता के अनुसार, चातुर्मास (आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक) के दौरान भगवान विष्णु क्षीरसागर में योग निद्रा में लीन रहते हैं। यह अवधि चार महीनों की होती है, जिसमें सावन मास, नवरात्रि, गणेश पूजा और दीवाली (कार्तिक अमावस्या) शामिल है। इस समय भगवान विष्णु को “सोया हुआ” माना जाता है, अर्थात् वे सृष्टि के संचालन से विश्राम लेते हैं। इस कारण उनकी सक्रिय पूजा कुछ कम हो जाती है, और अन्य देवताओं की पूजा अधिक प्रचलित होती है। इस अवधि में संसार का संचालन अलग-अलग देवी देवताओं द्वारा किया जाता है जिसका उल्लेख हमने दूसरी कहानी में किया है, इसका शीर्षक “देवशयनी एकादशी का रहस्य” है ।
लेकिन गणेश जी के साथ ही क्यों?
गणेश जी के साथ पूजा करने के पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं, हमसे हम 3 प्रमुख कथाओं के बारे में जानते हैं:
- भगवान गणेश को अपना दत्तक पुत्र स्वीकार करना
एक प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माँ लक्ष्मी को अपने ऐश्वर्य और धन पर गर्व हो गया था। भगवान विष्णु ने उनका अहंकार तोड़ने के लिए कहा कि एक स्त्री तब तक अपूर्ण है जब तक उसे मातृत्व का सुख प्राप्त न हो। इस बात से दुखी होकर माँ लक्ष्मी ने देवी पार्वती से उनके पुत्र गणेश को गोद लेने का अनुरोध किया। पार्वती जी ने यह सोचकर हिचकिचाईं कि लक्ष्मी जी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहतीं, तो वे गणेश का ध्यान कैसे रखेंगी।
तब माँ लक्ष्मी ने वचन दिया कि जो भी उनकी पूजा करेगा, उसे पहले गणेश जी की पूजा करनी होगी, अन्यथा वह उसे अपना आशीर्वाद नहीं देंगी। उन्होंने यह भी कहा कि जहाँ गणेश होंगे, वहाँ वे स्वयं स्थिर रूप से निवास करेंगी। इस कथा के अनुसार, गणेश जी माँ लक्ष्मी के दत्तक पुत्र हैं और इसलिए दिवाली पर माँ और पुत्र की तरह उनकी पूजा साथ में की जाती है।
2 . लक्ष्मी-गणेश पूजा का प्रचलन:
दीवाली का पर्व धन, समृद्धि और नई शुरुआत से जुड़ा है। इस दिन माँ लक्ष्मी (धन की देवी) और भगवान गणेश (विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता) की पूजा का विशेष महत्व है। चूंकि चातुर्मास में भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं, दीवाली की पूजा में लक्ष्मी और गणेश का जोड़ा अधिक प्रखर हो जाता है। यह पूजा व्यावहारिक और प्रतीकात्मक रूप से धन और सफलता के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
गणेश जी बुद्धि और ज्ञान के देवता हैं: गणेश जी को ‘विघ्नहर्ता’ (बाधाओं को दूर करने वाले) और ‘बुद्धि प्रदाता’ (ज्ञान प्रदान करने वाले) के रूप में जाना जाता है। लक्ष्मी जी धन और समृद्धि की देवी हैं: माँ लक्ष्मी धन, ऐश्वर्य और भौतिक सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं।
यह माना जाता है कि केवल धन होने से जीवन में पूर्णता नहीं आती। धन का सही उपयोग करने और उसे बनाए रखने के लिए बुद्धि और विवेक का होना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए, दिवाली पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा करने का अर्थ है कि हम धन के साथ-साथ उसे सही ढंग से इस्तेमाल करने की बुद्धि भी मांगते हैं। बिना ज्ञान के मिला धन अक्सर नष्ट हो जाता है या उसका दुरुपयोग होता है।
3. गणेश जी को प्रथम पूज्य होने का वरदान
किसी भी शुभ कार्य या पूजा की शुरुआत में सबसे पहले गणेश जी की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि उनकी पूजा के बिना कोई भी कार्य सफलतापूर्वक पूरा नहीं होता और उसमें बाधाएं आ सकती हैं। दिवाली की पूजा भी एक महत्वपूर्ण शुभ कार्य है, इसलिए परंपरा के अनुसार गणेश जी की पूजा पहले की जाती है ताकि लक्ष्मी पूजा निर्बाध रूप से संपन्न हो सके और उनकी कृपा प्राप्त हो।
चातुर्मास के अंत में, देवउठनी एकादशी (जो दीवाली के बाद आती है) पर भगवान विष्णु के जागने की मान्यता है। इस दिन उनकी विशेष पूजा होती है, और तुलसी विवाह जैसे आयोजन किए जाते हैं, जिसमें लक्ष्मी और विष्णु की संयुक्त पूजा का महत्व होता है। इसलिए, दीवाली पर लक्ष्मी-गणेश पूजा का प्रचलन है, जबकि विष्णु जी की पूजा चातुर्मास के बाद अधिक प्रखर होती है।
शुभ दीपावली
देवी लक्ष्मी एवं भगवान गणेश
स्वर्णिम सिंहासनों पर विराजमान हैं
चारों ओर दीपों की मधुर ज्योति से आलोकित वातावरण
गहरे लाल पुष्पों से सुसज्जित पृष्ठभूमि
और देवी-देवताओं की दिव्य आभा से भरपूर
एक शांत, समृद्ध और मंगलमय दृश्य।
शुभता और समृद्धि का पर्व — दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

