तारकासुर को वरदान और उसका आतंक
ब्रह्मा जी का वरदान :
काफी समय पुरानी कहानी है, दैत्यों का राजा तारकासुर और अधिक शक्तिशाली बनने के लिए ब्रह्मा जी तपस्या की। दैत्यराज तारकासुर ने कठिन तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया। उसने दो वरदान माँगे:
- वह अत्यंत बलवान हो और कोई दूसरा उसके समान शक्तिशाली न हो।
- वह अमर हो जाए।
ब्रह्मा जी ने पहले वरदान को स्वीकार किया, लेकिन अमरता का वरदान देने से इनकार कर दिया, क्योंकि मृत्यु अटल है। इसके बजाय, तारकासुर की तीव्र इच्छा पर, ब्रह्मा जी ने उसे एक ऐसी शर्त के साथ मृत्यु का वरदान दिया, जिसे वह असंभव मानता था। तारकासुर ने माँगा कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही हो सके। उसे विश्वास था कि शिव तो समाधि में लीन रहते हैं और कभी विवाह नहीं करेंगे, इसलिए उनका पुत्र होना असंभव है।
वरदान मिलते ही तारकासुर ने तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) में भयंकर उत्पात मचाना शुरू कर दिया। उसने देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया और ऋषि-मुनियों, तथा मनुष्यों पर अत्याचार किए। देवता उससे अत्यंत पीड़ित हो गए और अपनी रक्षा के लिए ब्रह्मा जी के पास पहुँचे।
शिव–पार्वती का विवाह और कामदेव दहन
ब्रह्मा जी का उपाय
देवताओं की पीड़ा देखकर ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि तारकासुर का वध केवल शिव के पुत्र द्वारा ही संभव है। उन्होंने देवताओं को बताया कि माता सती अब माता पार्वती के रूप में जन्म ले चुकी हैं और वे शिव से विवाह करेंगी।
कामदेव का बलिदान
समस्या यह थी कि भगवान शिव घोर तपस्या में लीन थे और सांसारिक मोह से दूर थे। देवताओं ने शिव की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को भेजा। कामदेव ने अपनी पत्नी रति के साथ मिलकर शिव की तपस्या भंग करने का प्रयास किया और उन पर पुष्प बाण चलाए। शिव की तपस्या भंग हुई, लेकिन वे अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने अपनी तीसरी आँख खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया।
इसी घटना के बाद, कामदेव की पत्नी रति ने शोक में आकर माता पार्वती को श्राप दिया कि वे कभी अपने गर्भ से किसी संतान को जन्म नहीं दे पाएंगी।
शिव–पार्वती विवाह – बाद में, देवताओं के समझाने पर और पार्वती की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर, भगवान शिव ने उनसे विवाह किया।
कार्तिकेय (स्कन्द) का जन्म और वध
कार्तिकेय की उत्पत्ति
शिव और पार्वती के मिलन से एक दिव्य तेज या बीज उत्पन्न हुआ। यह बीज इतना प्रचंड था कि कोई भी इसे धारण नहीं कर सकता था।
- शिव ने यह बीज अग्नि देव को दिया।
- अग्नि देव भी इसे धारण नहीं कर पाए और उन्होंने इसे गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया।
- गंगा ने इस तेज को शरतवन (सरकंडों के वन) में छोड़ दिया।
- वहाँ इस तेज से एक सुंदर बालक का जन्म हुआ।
- इस बालक का पालन पोषण छह कृतिकाओं (सप्तर्षियों की पत्नियाँ) ने किया।
- माता पार्वती ने बाद में इन छह रूपों को मिलाकर एक कर दिया, और बालक को छह मुखों (षडानन) वाला रूप प्राप्त हुआ। चूंकि उनका पालन कृतिकाओं ने किया, इसलिए वे कार्तिकेय कहलाए।
तारकासुर का वध
कार्तिकेय का जन्म अल्पकाल में ही हुआ था। देवताओं के आग्रह पर, कार्तिकेय ने उनका सेनापति बनना स्वीकार किया। जब वे केवल सात दिन के थे, तब उन्होंने देवताओं की सेना का नेतृत्व किया।
कार्तिकेय ने युद्ध में तारकासुर को ललकारा। ब्रह्मा जी के वरदान के अनुसार, कोई भी उसे मार नहीं सकता था सिवाय शिव के पुत्र के। भीषण युद्ध के बाद, भगवान कार्तिकेय ने अपनी शक्ति और अस्त्रों का उपयोग करके तारकासुर का वध किया, और इस प्रकार तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त कराया।
यह कथा न केवल एक दैत्य के वध की है, बल्कि यह त्याग, तपस्या, प्रेम और कर्तव्य पालन के महत्व को भी दर्शाती है।
तारकासुर का वध करने के बाद, कार्तिकेय ने न केवल देवताओं को उनका स्थान वापस दिलाया, बल्कि उनका एक और महत्वपूर्ण नाम पड़ा, जो उनके पराक्रम का प्रतीक है।
- तारकासुर के वध के कारण ही कार्तिकेय को स्कन्द या स्कन्दकुमार (शक्तिशाली योद्धा) के नाम से भी जाना जाता है। इसके साथ ही माता पार्वती को स्कंदमाता कहा जाता है।
- उन्हें ‘देव सेनापति’ या देवताओं के सेनापति के रूप में भी सम्मानित किया जाता है।
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हर हर महादेव

