क्या आप जानते हैं माता पार्वती को गर्भवति ना होने का श्राप मिला था, तो शिव-पार्वती को 2 पुत्र और एक कन्या का सुख कैसे मिला?
माँ पार्वती को एक श्राप मिलने के कारण वो कभी गर्भवती नहीं हो सकती थी, इसके अलावा भी माता पार्वती कार्तिकेय, अशोक सुंदरी और गणेश जी की माँ बनी। वैसे तो ये तीनो ही संतान शिव-पार्वती के हैं लेकिन उनमें से किसी का भी जन्म माता पार्वती के गर्भ से नहीं हुआ है। इसके पीछे की क्या कथा है, इसके बारे में हम जानेंगे…
शिव पुराण के अनुसार, एक बार तारकासुर ने तपस्या कर के ब्रह्म देव को प्रसन्न कर के अपने मन का वरदान मांग लिया। तारकासुर ने ब्रह्म देव से वरदान मांगा कि उसके जैसा दूसरा कोई बलवान ना हो और दूसरा वरदान ये मांगा कि वह हमेशा अमर रहे। तारकासुर की तपस्या से प्रसन्न हो कर ब्रह्म देव ने उसे दोनो वरदान दे दिया। ब्रह्मा जी से वरदान मिलने के बाद तारकासुर ने पूरी दुनिया में अपना आतंक मचाना शुरू कर दिया। तारकासुर ने स्वर्ग के देवताओं के साथ धरती के मनुष्यों और ऋषियों पर भी अत्याचार किया। तारकासुर ने तीन लोक पे अपना अधिकार प्राप्त करने के बाद स्वर्ग लोक से सभी देवताओं को निकाल दिया।
इसके बाद इंद्र देव सहित सभी देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उन्हें तारकासुर के अत्याचार की सारी कहानी बताई और तारकासुर से अपने प्राणों की रक्षा के लिए विनती की। तब ब्रह्मा जी देवताओ के कष्ट देख कर बहुत दुखी हुए और उन्होन देवताओ से कहा की इस स्थिति में अब वो कुछ नहीं कर सकते क्यू की उन्होन ही तारकासुर की तपस्या से प्रसन हो कर उसे बालशाली और अमर होने का वरदान दिया था। देवताओ की पीड़ा देख कर ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि तारकासुर का अंत अब सिर्फ भगवान शिव के संतान द्वारा ही संभव है।
ये सुनकर सभी देवता आश्चर्यचकित रह गए क्योंकि माता सती का शरीर अग्नि में नष्ट हो चुका था। तब ब्रह्मा जी ने बताया कि माता सती दोबारा माता पार्वती के रूप में जन्म लेंगी। अब शिव-पार्वती के विवाह के बाद उनकी होने वाली संतान के माध्यम से ही तारकासुर का वध होगा। माता पार्वती पूरी तरह से शिव जी के प्रति समर्पित थी। इसलिया सभी देवी-देवताओ ने शिव का दिल जितने में उनकी मदद की और फिर शिव-पार्वती का विवाह भी हो गया। महादेव हमेशा से ही तपस्या में लीन रहते थे।
विवाह के बाद देवताओं ने कामदेव को भगवान शिव की तपस्या भंग करने के लिए भेजा ताकि वो शिव की तपस्या भंग कर उन्हें काम के प्रति मोहित कर सके, जिस से शिव-पार्वती की संतान के माध्यम से उनका उद्धार हो सके। तब कामदेव अपनी पत्नी रति के साथ कैलाश पहुंचे और कामदेव ने शिव की तपस्या भंग कर दी। तपस्या भंग होने से भगवान शिव बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने कामदेव को वही पे भस्म कर दिया।
जब रति ने अपने पति को भस्म हुआ देखा तो वो बहुत दुखी हुई और माता पार्वती से कहा कि तुम्हारी वजह से मैंने अपना पति खो दिया और साथ ही मां बनने का सुख भी खो दिया है। उसके बाद देवी रति ने अपने पति की राख अपने हाथ में लेकर माता पार्वती को श्राप दिया कि जिस तरह मैंने मां बनने का सुख खो दिया वैसे ही मैं पार्वती को श्राप देती हूं कि वो भी अपने गर्भ से किसी संतान को जन्म नहीं दे पाएंगी। बाद में जब शिव जी का क्रोध शांत हुआ तब देवताओं ने शिव जी को तारकासुर को मिले वरदान के बारे में बताया। तब कामदेव की पत्नी रति ने शिव जी से कामदेव को पुन: जीवित करने के लिए विनती की। तब शिव जी ने अपने प्रभाव से कामदेव को पुन: जीवित कर दिया।
रति से मिले श्राप की वजह से माता पार्वती ने कभी भी अपने गर्भ से किसी संतान को जन्म नहीं दिया था, तो आखिर माँ पार्वती और शिव जी की 3 संतानें कैसी हुई? आइए जानते हैं…
कार्तिकेय की उत्पत्ति: कार्तिकेय की उत्पति शिव के ब्रह्माण्डीय ऊर्जा से हुई थी। शिव पुराण के अनुसार, शिव और पार्वती के मिलन से एक दिव्य बीज उत्पन्न हुआ। ये बीज इतना गर्म था कि कोई भी स्त्री इस बीज को अपने गर्भ में धारण नहीं कर सकती थी, स्वयं माता पार्वती भी नहीं। तब शिव जी ने अपना बीज हवन कुंड में दाल दिया। हवनकुंड मतलब जरूरी नहीं कि आग कुंड, ये एक तरह होमकुंड था। होमकुंड ऋषियों के लिए एक प्रयोगशाला की तरह था, जहां वो बहुत सारी चीजों को उत्पन्न करते थे। शिव जी के बीज को छः कृतिकाओ (सप्तऋषियों की पत्नियां) ने अपने अंदर साढ़े तीन महीने तक धरण किया, जिनसे छः अलग-अलग छः भ्रूण विकसित हुआ। बाद में माता पार्वती ने इन छः भ्रूण को एक बालक के रूप में प्रकट कर दिया, जिस से उनका छः सिर और एक शरीर वाला कार्तिकेय के रूप में जन्म हुआ। चूकि इनका पालन पोषण छह कृतिकाओ द्वार किया गया था इसलिए इन्हें कार्तिकेय नाम दिया गया।
गणेश जी की उत्पत्ति : पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही और तब वह अपने शरीर पर उपटन लगाई हुई थी। स्नान से पूर्व माता पार्वती ने अपने शरीर का उबटन उतार कर उसी उबटन से एक बालक की प्रतिमा बना दी और उसके बाद प्रतिमा में प्राण डाल दिए। माता पार्वती ने बालक का नाम गणेश रखा और उसे अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया। और फिर गणेश जी को अपना द्वारपाल बना कर स्नान करने चली गयी। जाते जाते गणेश को आज्ञा दी कि वो किसी को भी अंदर ना आने दे।
उनके बाद गणेश जी माता पार्वती की आज्ञा के अनुसार द्वार पे पहरा देने लगे, जब शिव जी हिमालय से तपस्या करके लौटे तो अंदर जाने लगे तो उन्हें अंदर जाने से रोका। इस से भगवान शिव बहुत नाराज हुए और गुस्से में गणेश का सिर अपने त्रिशूल से अलग कर दिया। माता पार्वती को जब इस बात का पता चला तो वो बहुत नाराज हुई और अपना उग्र रूप धारण कर लिया और शिव जी से गणेश का सर धर से जुड़ने को कहा। तब भगवान शिव ने गणेश का सिर वापस नहीं जोड़ पाने की अपनी अक्षमता को स्वीकार किया और बताया कि उनके त्रिशूल का प्रभाव उल्टा नहीं हो सकता। और तब शिव जी ने विष्णु जी से कहा कि जो भी पहला प्राणि मार्ग में अकेला दिखे जिसकी मां उसके साथ न हो उसका सिर ले आने को कहा। तब विष्णु जी एक हाथी के बच्चे का सिर ले कर आये। तब शिव जी ने हथिनी के बच्चे का सिर गणेश के शरीर पर रख दिया और अपनी शक्ति से उन्हें जीवनदान दिया। तब गणेश जी को वहां मौजुद अनेक देवी-देवताओं द्वारा अनेक शक्तियों के साथ आशीर्वाद दिया गया था और ये भी कि कोई भी पूजा शुरू करने से पहले सबसे पहले उन्हें पूजा जाएगा। तब से उन्हें गजानन और प्रथम पूजनीय भगवान कहा जाता है।
अशोक सुंदरी की उत्पत्ति: कार्तिकेय और गणेश जी के अलावा भगवान शिव और पार्वती की एक पुत्री भी थी। जिनका नाम अशोक सुंदरी था। माता पार्वती का अकेलापन दूर करने हेतु अशोक सुंदरी की उत्पति हुई थी। एक बार माता पार्वती शिव जी के साथ एक सुंदर वन में गई। जहां उन्हें एक कल्पवृक्ष से बहुत लगाव हो गया। कल्पवृक्ष मनोकामना पूर्ण करने वाला वृक्ष है। माता पार्वती ने कल्पवृक्ष से अपना अकेलापन दूर करने के लिए एक कन्या का वर मांगा। तब कल्पवृक्ष से एक सुंदर कन्या का जन्म हुआ जिसका नाम माता पार्वती ने अशोक सुंदरी रखा।
तो ये थी भगवान शिव और मां पार्वती की 3 संतानों की कहानी, अगर आप इस कहानी के बारे में और भी कुछ जानते हैं तो जरूर कमेंट करें…..
हर हर महादेव

