गणेश-चतुर्थी-की-कहानी

गणेश चतुर्थी: एक उत्सव, कई कहानियाँ

भारत के दक्षिणी राज्यों और महाराष्ट्र में भाद्रपद मास की गणेश चतुर्थी मनाने की परंपरा बहुत पुरानी है। पहले यह एक साधारण पारिवारिक पूजा थी, जिसमें लोग घर पर ही मिट्टी, हल्दी और दूध से हथेली के आकार की मूर्तियाँ बनाते थे और पूरा परिवार मिलकर उनकी पूजा करता था। 

शिवाजी महाराज के शासनकाल में मराठा साम्राज्य में गणेश चतुर्थी एक बड़े उत्सव का रूप ले चुकी थी। बाद में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण भी चल रहा था। जहाँ उत्तर भारत में राम और कृष्ण लीलाओं का आयोजन बड़े पैमाने पर हो रहा था, वहीं लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव को भी सार्वजनिक रूप से मनाने का विचार रखा।

उन्होंने पुणे में इस उत्सव को बड़े पैमाने पर शुरू किया। इसी समय से पंडालों में गणेश जी की बड़ी प्रतिमाएं स्थापित करने की प्रथा शुरू हुई। धीरे-धीरे, मूर्ति को निर्माण स्थल से पंडाल तक लाने की यात्रा और गणेश विसर्जन भी एक भव्य उत्सव बन गया, जिससे लाखों लोगों की भावनाएं जुड़ गईं।

ये गणेश पंडाल स्वतंत्रता सेनानियों के लिए मिलने-जुलने और महत्वपूर्ण बैठकें आयोजित करने का एक गुप्त स्थान भी बन गए। इस उत्सव ने समाज के सभी वर्गों को एक साथ लाने और बड़े-छोटे के भेद को मिटाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी तरह, गणेश उत्सव और गणेश चतुर्थी महाराष्ट्र की संस्कृति की पहचान बन गए।

महाराष्ट्र में गणेश पूजा की पौराणिक कथा

महाराष्ट्र में गणेश पूजा की शुरुआत के पीछे एक पौराणिक कथा और उससे जुड़ी लोककथा का मिश्रण है। इस कथा के अनुसार, शिवपुत्र कार्तिकेय ने राक्षस तारकासुर का वध किया था। जब कार्तिकेय तारकासुर का वध करने के बाद कैलाश पर्वत पर पहुँचे, तो शिव जी ने उनकी उतनी प्रशंसा नहीं की जितनी उन्हें उम्मीद थी। अन्य देवता भी तारकासुर के वध के बाद महादेव की जय-जयकार करने लगे। देवताओं का मानना था कि जिसने तारकासुर का वध किया है, स्वर्ग पर उसी का अधिकार होना चाहिए, लेकिन शिव जी ने कार्तिकेय को केवल ‘देवसेनापति’ बनाया, ‘इंद्र’ का पद नहीं दिया। इससे कार्तिकेय बहुत दुखी हुए और कैलाश छोड़कर चले गए।

गणेश जी का दक्षिण आगमन

जब गणेश जी की उत्पत्ति हुई, तो वे माता पार्वती की चिंता दूर करने के लिए अपने बड़े भाई कार्तिकेय से मिलने दक्षिण दिशा की ओर निकल पड़े। उनकी मुलाकात दक्षिण भारत के समुद्री तट पर हुई। वहाँ के लोगों ने भगवान गणेश का एक प्रिय अतिथि के रूप में स्वागत किया और उनकी खूब पूजा-अर्चना की। इसी घटना के बाद से, दक्षिण भारत में गणेश पूजा की परंपरा शुरू हुई मानी जाती है।

ऐसा कहा जाता है कि कई वर्षों के सूखे के बाद जब गणेश जी दक्षिण की भूमि पर आए, तो वहाँ वर्षा हुई और समृद्धि लौटी। इसलिए, वहाँ के लोग गणेश जी को एक ऐसे प्रिय अतिथि की तरह मानते हैं जिन्होंने उनके जीवन में खुशहाली ला दी। दक्षिण में, जहाँ कार्तिकेय को रक्षक और स्वामी के रूप में पूजा जाता है, उनके छोटे भाई के आगमन पर लोगों ने उनका राजा की तरह स्वागत किया। गणेश जी के वहाँ 10 दिन रहने के कारण, उन्हें 10 दिनों तक एक मेहमान के रूप में पूजा जाता है और अगले साल फिर से आने की कामना के साथ विदा किया जाता है।

उत्तर बनाम दक्षिण – उत्तर भारत में गणेश प्रतिमा का विसर्जन करना सही है?

गणेश विसर्जन को लेकर अक्सर एक बहस छिड़ जाती है। महाराष्ट्र में यह एक भव्य उत्सव है, जिसमें लाखों लोग हिस्सा लेते हैं। वहीं, कुछ लोग मानते हैं कि उत्तर भारत में गणेश विसर्जन सिर्फ महाराष्ट्र की नकल है।

यह तर्क दिया जाता है कि जब गणेश जी का मूल निवास स्थान उत्तर भारत है, तो वे वहाँ से विदा होकर कहाँ जाएँगे? महाराष्ट्र में उन्हें एक अतिथि के रूप में पूजा जाता है, इसलिए उनकी विदाई का उत्सव मनाया जाता है। लेकिन, जब उनका घर ही उत्तर में है, तो विदाई का क्या औचित्य? यह विचार विसर्जन के पीछे की भावना और सांस्कृतिक संदर्भों पर सवाल उठाता है।

ये भी काफी विवाद का विषय है। आपकी इस बारे में क्या राय है, कृपा कमेंट में जरूर बताएं

यदि हम स्थापना के विचार को स्वीकार करते हैं, तो विसर्जन भी उसका एक अनिवार्य हिस्सा है। यह चक्र ठीक उसी तरह है जैसे जन्म और मृत्यु, सुख और दुःख, और समय की गणना का चक्र। इसलिए, जब किसी देवता की स्थापना की जाती है, तो उनका विसर्जन भी किया जाता है। यह पूजा-विधान का एक अनिवार्य अंग है। किसी भी विशेष पूजा या अनुष्ठान के बाद, हवन संपन्न होने पर देवताओं से उनके अपने स्थान पर लौटने का आह्वान किया जाता है।

यही कारण है विसर्जन के मंत्र में भी इसका उल्लेख है

यान्तु देवगणा: सर्वे पूजामादाय मामकिम।
इष्टकाम समृद्धयर्थं पुनरागमनाय च।।

अर्थात :-हे देवगण, आप सभी की मैंने पूजा की है, जैसे मुझे आती थी। आप से प्रार्थना है कि आप मेरी पूजा स्वीकार करें और अपने स्थान पर जाएं। वहीं से मेरी रक्षा करते रहें और मेरी इष्ट कामना को पूरा करें और आगे भी मेरे आह्वान को स्वीकार करके मेरे निवास पर आते रहें। इस मंत्र को बोलकर देवताओं का नाम लेकर और उनका बीज मंत्र बोलते हुए उनका विसर्जन किया जाता है।

उत्तर बनाम दक्षिण

उत्तर भारत में गणेश-लक्ष्मी को लेकर मान्यता है कि वह सभी घरों में निवास करते हैं और उनके रूप में हर किसी की आर्थिक समृद्धि बनी रहती है। इसलिए गृहस्थ लोगों के घरों में गणेश-लक्ष्मी को हमेशा स्थापित करके रखा जाता है, उनकी विदाई दिवाली पर तभी की जाती है, जब उसी दिन नई प्रतिमा की स्थापना की जाती है. घरों में गणेश-लक्ष्मी की प्रतिमा हथेली से भी छोटी होती है, जो कि घरों में देव प्रतिमा रखने का शास्त्रीय नियम भी है।

पंडालों में प्रतिमाएँ काफी बड़े आकार की होती हैं और उनकी प्राण प्रतिष्ठा नहीं की जाती है। उनका सिर्फ पूजन किया जाता है। बिना प्राण प्रतिष्ठा के ऊँची प्रतिमाओं को रखना सिर्फ सजावट की तरह होता है। वे देवता और उनसे जुड़ी कथा की एक झलक होती है।यदि षोडशोपचार पूजन विधि से पूजन किया जाता है तो शास्त्रीय आधार पर उनका विसर्जन अनिवार्य हो जाता है।

गणेश चतुर्थी: विकारों का विसर्जन

गणेश चतुर्थी का सार केवल देव प्रतिमा का पूजा या  विसर्जन करना नहीं है, बल्कि सच्चे मन से अपने विकारों को भगवान को अर्पित करना है। इन दस दिनों में हम अपने भीतर की बुराइयों को गणेश जी के चरणों में चढ़ाते हैं।

  • दुर्वा हमारे क्रोध का प्रतीक है, जिसे हम उनके चरणों में अर्पित करते हैं।
  • सिंदूर हमारे अभिमान का प्रतीक है, जिसे हम भगवान को समर्पित करते हैं।
  • मोदक हमारी सांसारिक लालसाओं का प्रतीक है, जिन्हें हम उन्हें अर्पित करते हैं।

जब हम गणेश विसर्जन करते हैं, तो हम वास्तव में इन्हीं विकारों का विसर्जन कर रहे होते हैं। ये विकार इतने शक्तिशाली होते हैं कि केवल विघ्नहर्ता महागणपति ही इन्हें अपने साथ ले जा सकते हैं। इसीलिए, गणेश जी को विघ्नविनाशक कहा जाता है।

गणपति बाप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया। सिद्धिविनायक मोरया, गिरिजा नंदन मोरय मोरया।।  
गणेश चतुर्थी की बधाई

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