खंडित-मूर्ति-और-संपूर्ण-समर्पण-Story-Cover.png

खंडित मूर्ति और संपूर्ण समर्पण

एक समय की बात है, रुद्र नाम का एक अत्यंत निपुण शिल्पकार था। उसका जीवन महादेव की पूर्णता की खोज में समर्पित था। रुद्र की एक ही इच्छा थी: वह भगवान शिव की ऐसी प्रतिमा बनाए, जिसमें उनका परम तत्व दिखे, ऐसी जो दोष-मुक्त और अनुपम हो।

रुद्र ने कई साल तपस्या की और पत्थरों को तराशा। उसने एक से बढ़कर एक सुंदर मूर्तियाँ बनाईं, पर हर बार, अंतिम क्षण में, उसे लगता कि उसकी रचना में कोई कमी रह गई है। हर बार उसका अहंकार उससे कहता, “यह अधूरा है। यह महादेव की शान के लायक नहीं।” और वह क्रोध में आकर अपनी ही बनाई मूर्ति को खंडित कर देता।

धीरे-धीरे, रुद्र की कला तो बढ़ती गई, पर उसके मन की शांति छिन गई। वह थक-हार कर, एक पर्वत की चोटी पर बैठ गया, जहाँ उसने सबसे बड़ा और कठिन पत्थर चुना था।

तीन महीने की लगातार मेहनत के बाद, जब उसने छेनी और हथौड़ा रखा, तो सामने भगवान शिव की एक ऐसी मूर्ति थी, जिसे देखकर देवता भी दंग रह जाते। वह पूर्ण थी—रुद्र की कल्पना से भी ज़्यादा पूर्ण।

रुद्र की आँखों में आँसू आ गए। वह आगे बढ़ा, प्रणाम करने ही वाला था कि उसी क्षण, उसकी नज़र मूर्ति के बाएँ अँगूठे पर पड़ी। बहुत छोटा, पर एक दोष था—शिल्प में हल्का सा चूक था।

रुद्र का दिल टूट गया। उसने उस पत्थर को उठाया जिससे वह अभी मूर्ति तोड़ने वाला था। उसने आँखें बंद की और महादेव का नाम लिया, “हे महाकाल, मैं हमेशा तुम्हारी पूर्णता ढूँढ़ता रहा, पर मैं तो एक साधारण व्यक्ति हूँ। मेरा अहंकार ही मेरा सबसे बड़ा दोष है।”

उसने अपनी आँख खोली और जब उसने पत्थर मूर्ति पर मारने के लिए हाथ उठाया, तो उस मूर्ति  से एक दिव्य ध्वनि आई। वह आवाज़ रुद्र के हृदय में गूँज गई:

“रुद्र, रुक जाओ। तुमने अपने शिल्प में पूर्णता खोजी, पर तुम्हारी शिल्पकारी में मैं नहीं, तुम्हारा अहंकार रहता था। आज, जब तुमने अपनी कमज़ोरी को स्वीकार किया और शांति से इस खंडित रूप को प्रणाम करने का निर्णय लिया, तभी मेरी दिव्यता इसमें आई। पूर्णता मूर्ति में नहीं, तुम्हारे समर्पण में है।”

रुद्र ने तुरंत पत्थर फेंक दिया और उस थोड़ी सी खंडित मूर्ति के चरणों में झुक गया। उस दिन उसे समझ आया कि ईश्वर को प्रभावित करना नहीं, बल्कि समर्पित होना ज़रूरी है।

कहानी का सार (Moral of the Story):

महादेव दोष-मुक्त कला में नहीं, बल्कि उस भक्त के हृदय में रहते हैं जो अपने अहंकार को छोड़कर, साधारण रूप में भी उनका स्वागत करता है।

अधूरेपन में ही पूरी भक्ति है।

हर हर महादेव

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *